ravi

Posted by sameer | 12:23 PM

हर प्रशन का उत्तर एक नया प्रशन उत्तपन करता है और आपने तो केवल प्रशन किया है और उत्तर मुझसे ,हाँ तुम इन प्रश्नों का उत्तर ईस्वर को मानते हो लेकिन मैं लिए मात्र एक संभावना,किसी प्रश्न का कोई सार्थक जवाब न हो तो क्या हम उसे ईस्वर पर धकेल दे,आज भी हमें बहुत से प्रश्नों के जवाब नहीं मालूम है तो क्या हम उन्हें ईस्वर पर छोड़ दे नहीं पहले भी बहुत प्रश्नों के जवाब नहीं मालूम थे लेकिन आज मालूम है,मेरे इन सब बातो का एअर्थ यह नहीं ये की मे ईस्वर को नकार रहा हु,और मे एक बात कहना चाहूगा मनुष्य हर जगह प्रश्नों का सहारा लेकर ईस्वर को सिद्ध करने की चेष्टा करता है प्रश्न बदले हो सकते है लेकिन ईस्वर को नाम लेकर वह आगे के प्रश्नों को गिरा देता है अर्थाथ वह प्रशन समाप्त कर देता है जबकि उसके आगे प्रशन शेष है की वह कैसा है,उसका आकार कैसा है ,वह कौन है ,वह कब से है ,क्या वह अंतिम ईस्वर है ,वह कहा से आया है यह सवाल आजीब से लगे गे क्योकि यह उस ईस्वर के विषय मे है जिस पर हम अपने प्रश्नों को विराम लगा देते है,हम ईश्वर की खोज नहीं करते है बस प्रश्नों से संतुष्ट हो जाते है,जबकि प्रशन शेष है इसलिए मे कहता हूँ की खोजी बनो, इसलिए मैं धयान को एक मात्र रास्ता मानता हु जिससे सायद ईस्वर का अनुभव हो सके,ध्यान इस लिए क्योकि इसमें तुमको ज्ञानी नहीं महा अज्ञानी होना है क्योकि तुमको अपने मस्तिस्क सभी विचारो का त्याग करना होगा तो प्रश्नों होने का सवाल ही नहीं उत्पन्न होता,

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